February 22, 2025

बच्चों में नैतिक गुण विकसित करने हेतु मंथन-सम्पूर्ण विकास केन्द्रों मेंनैतिक सत्रों का आयोजन

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New Delhi News, 19 Feb 2020 : वास्तविक शिक्षा वही है जो चारित्रिक शक्ति का विकास कर सके, मन में परहित की भावना पैदा कर सके।किन्तु आज हमारी शिक्षा केवल अर्थोपार्जन का एक व्यवसाय बनकर रह गई है। नैतिक मूल्यों का शिक्षा में कोई स्थान नहीं बचा है। यही कारण है कि आज के विद्यार्थियों का समाज या देश से जुड़ाव नहीं है।विद्यार्थियों में पुनः नैतिकता के गुणों को ढालने एवं उनके चरित्र के पूर्णरूपेण निर्माण के लिए फरवरी माह मेंमंथन- संपूर्ण विकास केंद्र ने अपने दिल्ली स्थित केन्द्रों मेंनैतिकसत्रों का आयोजन किया।

मंथन – संपूर्ण विकास केंद्र, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान का एक सामाजिक प्रकल्प है जो देश के अभावग्रस्त वर्ग को नि:शुल्क तथा मूल्याधारित शिक्षा प्रदान कर उनके संपूर्ण व्यक्तित्व को निखारने हेतु कई वर्षों से कार्यरत है। इसी प्रयास में मंथन- संपूर्ण विकास केंद्र समय-समय पर बच्चों के शैक्षणिक, आध्यात्मिक, नैतिक तथा मानसिक विकास हेतु विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करता रहता है।

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की प्रचारक शिष्याओं एवं स्वयंसेवकों ने इन नैतिक सत्रों को गति प्रदान की। नैतिकता के व्यावहारिक पक्ष की बेहतर स्पष्टता और समझ सुनिश्चित करने के लिए छात्रों को विभिन्न खेलों, ऑडिओ-विडियो एवं विभिन्न रोचक गतिविधियों के माध्यम से समझाया गया। कई उदाहरणों जैसे एकलव्य, अर्जुन आदि के जीवन के माध्यम से साध्वी जी ने जीवन में नैतिक मूल्यों केसकारात्मक प्रभाव से बच्चों को अवगत करवाया। बच्चों की सक्रिय सहभागिता के कारण, साध्वी जी ने बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में बताया ताकि बच्चे अपनी सुरक्षा को लेकर सावधान हो सकें। इसके अतिरिक्तउन्होंने बच्चों को शिष्टाचार की भावना एवं व्यवहार से अवगत करवायाI शिष्टाचार बच्चों के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। अच्छे व्यव्हार से किसी का भी दिल जीता जा सकता हैI इसके साथ ही साध्वी जी ने शिक्षकों को भी नैतिकता के महत्त्व के बारे में बताते हुए समझाया कि शिक्षा वह है जो विद्यार्थी को किताबी ज्ञान के अलावा नयी चीजें सोचने-समझने के लिए प्रेरित करे। जो उन्हें जाति-धर्म के भेदभाव से दूर करभाईचारा बढ़ाए, महिलाओं के प्रति सम्मान तथा निर्धन व बेसहारा लोगों के प्रति सहानुभूति व सहायता की भावना पैदा कर सके। इन मूल्यों पर चलकर ही एकसुदृढ, सभ्य और स्वस्थ समाज की रचना की जा सकती है।

बच्चों ने एक अच्छे श्रोता के गुण सीखे जो निश्चित ही उनके भावी जीवन मंज लाभप्रद सिद्ध होगा।

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